ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधविश्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रकाश करता है| ज्योतिष भाग्य पर नहीं कर्म और केवल कर्म पर ही आधारित शास्त्र है|
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वर्ष की बारह संक्रांतियों के लिए दान की वस्तुयें
पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) के अनुसार
मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु।
षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।।
षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य।
मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।।
तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या।
द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु।
एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।।
विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।।
कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्।
अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त
कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।'
मेष में भेड़, वृषभ में गायें, मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ, कर्कट में घृतधेनु, सिंह में सोने के साथ वाहन, कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज, तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर, धनु में वस्त्र एवं वाहन, मकर में इन्घन एवं अग्नि, कुम्भ में गौएँ जल एवं घास, मीन में नये पुष्प।
अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण , विष्णुधर्मोत्तर, कालिका आदि।
स्कन्दे-धेनुं तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे।
सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।।
विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्।
तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये।
पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते।
तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्।
तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:।
देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:।
तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे।
तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:।
तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्।
त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:।
तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:।
सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।। हेमाद्रि (काल, पृष्ठ 415-416);
निर्णय सिंधु (पृष्ठ 218) के अनुसार गोसहस्त्र 16 महादानों में एक है।
'त्रिदिवे ते विराजन्ते'
'उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदा स्रह ते सूर्येण।'
राजमार्तण्ड में संक्रान्ति पर किये गये दानों के पुण्य-लाभ पर दो श्लोक हैं-
'अयन संक्रान्ति पर किये गये दानों का फल सामान्य दिन के दान के फल का कोटि गुना होता है
और
विष्णुपदी पर वह लक्ष गुना होता है;
षडशीति पर यह 86000 गुना घोषित है |
चंद्र ग्रहण पर दान सौ गुना
एवं
सूर्य ग्रहण पर सहस्त्र गुना,
विषुव पर शतसहस्त्र गुना
तथा
आकामावै (आ-आषाढ़, का-कार्तिक, मा-माघ, वै-वैशाख) की पूर्णिमा पर अनन्त फलों को देने वाला है।
भविष्यपुराण ने अयन एवं विषुव संक्रान्तियों पर गंगा-यमुना की प्रभूत महत्ता गायी है।
पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) के अनुसार
मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु।
षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।।
षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य।
मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।।
तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या।
द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु।
एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।।
विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।।
कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्।
अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त
कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।'
मेष में भेड़, वृषभ में गायें, मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ, कर्कट में घृतधेनु, सिंह में सोने के साथ वाहन, कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज, तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर, धनु में वस्त्र एवं वाहन, मकर में इन्घन एवं अग्नि, कुम्भ में गौएँ जल एवं घास, मीन में नये पुष्प।
अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण , विष्णुधर्मोत्तर, कालिका आदि।
स्कन्दे-धेनुं तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे।
सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।।
विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्।
तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये।
पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते।
तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्।
तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:।
देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:।
तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे।
तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:।
तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्।
त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:।
तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:।
सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।। हेमाद्रि (काल, पृष्ठ 415-416);
निर्णय सिंधु (पृष्ठ 218) के अनुसार गोसहस्त्र 16 महादानों में एक है।
'त्रिदिवे ते विराजन्ते'
'उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदा स्रह ते सूर्येण।'
राजमार्तण्ड में संक्रान्ति पर किये गये दानों के पुण्य-लाभ पर दो श्लोक हैं-
'अयन संक्रान्ति पर किये गये दानों का फल सामान्य दिन के दान के फल का कोटि गुना होता है
और
विष्णुपदी पर वह लक्ष गुना होता है;
षडशीति पर यह 86000 गुना घोषित है |
चंद्र ग्रहण पर दान सौ गुना
एवं
सूर्य ग्रहण पर सहस्त्र गुना,
विषुव पर शतसहस्त्र गुना
तथा
आकामावै (आ-आषाढ़, का-कार्तिक, मा-माघ, वै-वैशाख) की पूर्णिमा पर अनन्त फलों को देने वाला है।
भविष्यपुराण ने अयन एवं विषुव संक्रान्तियों पर गंगा-यमुना की प्रभूत महत्ता गायी है।
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वर्ष की बारह संक्रांतियों के लिए दान की वस्तुयें
Importance of Bali Pratipada
कार्तिक शुद्ध प्रतिपदा:
यह प्रतिपदा बलि प्रतिपदा, वीर प्रतिपदा (वामन पुराण) और ध्यूत प्रतिपदा (कृत तत्त्व) भी कही जाती है पुराणों के अनुसार इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शंकर को ध्यूत क्रीड़ा में हराया था।
उत्तर भारत में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है। लेकिन दक्षिण भारत में बलि और मार्गपाली पूजा का प्रचलन है।
यह प्रतिपदा "कौमुदी महोत्सव" का भी अंग है क्योंकि वर्ष के तीन शुभ दिनों में कौमुदी महोत्सव होता है इस पर्व को बलि कौमुदी भी कहते हैं।
बलि प्रतिपदा -
राजा बलि के द्वार पर पधारने वाले अतिथि/ याचक को उनसे मनोइच्छित दान मिलता था। दान देना गुण तो है; परंतु गुणों का अतिरेक भी अंततः दोष ही सिद्ध होता है। सत्पात्र को ही दान देना चाहिए, अपात्र को दिया गया दान कष्ट/विपदा का कारण बनता है। दैत्यराज बलि से कोई, कभी भी, कुछ भी मांगता, उसे वह देते थे। बलि राजा की अति उदारता के परिणाम स्वरूप संपत्ति अपात्र लोगों के हाथों में जाने से सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । तब भगवान श्रीविष्णु ने बलि की अतिदान शीलता के कारण होने वाली सृष्टि की हानि रोकने के लिए कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन ‘वामन’ (छोटे ब्रह्मचारी बालक) अवतार लिया और छोटे बालक ब्राह्मण का रूप ले कर बलि के द्वार पर भिक्षा में त्रिपाद भूमिदान मांगा। बलि राजा ने इस वामन को त्रिपाद भूमि दान कर दी । इसके साथ ही वामन ने विराट रूप धारण कर एक पैर से समस्त पृथ्वी नाप ली, दूसरे पैर से अंतरिक्ष एवं फिर बलिराजा से पूछा ‘‘तीसरा पैर कहां रखूं ?’’ उसने उत्तर दिया ‘‘तीसरा पैर मेरे मस्तक पर रखें’’। तब तीसरा पैर उसके मस्तक पर रख, उसे पाताल में भेजने का निश्चय कर वामन ने बलिराजा से कहा, ‘‘तुम्हें कोई वर मांगना हो, तो मांगो (वरं ब्रूहि) ।’’
उस समय बलि ने वर्ष में तीन दिन पृथ्वी पर बलिराज्य होनेका वर मांगा । वे तीन दिन हैं – नरक चतुर्दशी, दीपावली की अमावस्या एवं बलि प्रतिपदा । तब से इन तीन दिनों को ‘बलिराज्य’ कहते हैं।
इस अवसर पर जो भी दान किया जाता है वो अक्षय होता है
#बलि_प्रतिप्रदा, #गोर्वधन_पूजा, #अन्नकूट, #पूजा, #वीर_प्रतिपदा, #वामन_पुराण, #ध्यूत_प्रतिपदा, #कौमुदी_महोत्सव, #बलिराज्य
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Bali Pratipada,
बलि प्रतिपदा
Navpatrika Pujan in Navratri
मां दुर्गा के नौ रूपों में उनके हर स्वरूप की पूजा में कुछ विशेष वस्तुओं का प्रयोग होता है। जैसे हर रूप के लिए विशेष फूल, भोग और वस्त्रों का रंग आदि। उसी प्रकार माँ भगवती की पूजा अर्चना मे विशेष वृक्षों की पत्तियों का प्रयोग भी किया जाता है माँ दुर्गा के नौ स्वरुप कुछ विशिष्ट वृक्षों और औषधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं माना जाता है कि इन नव पत्रिकाओं को अर्पण करने से जीवन के दुख-दर्द और विपदाएं खत्म हो जाती हैं। हिंदू धर्म में हमेशा से वृक्ष तो सदैव पूजनीय ही माने गए हैं और नवरात्रि में इनका महत्व काफी बढ़ जाता है। तो आइए ज्योतिषाचार्य अंजू आनंद से जानते हैं कि मां दुर्गा पूजा के लिए नवपत्रिका की नौ पत्तियां का क्या महत्व है और कौन सी पत्रिका का माता का कौन सा स्वरूप प्रतिनिधत्व करता है।
नवपत्रिका पूजा में उपयोग होने वाली 9 पत्तियाँ
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Navpatrika Pujan in Navratri,
नवपत्रिका पूजा
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