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Muhurta Yoga




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राशि अनुसार होली के लिए कपड़ों और गुलाल का चयन




अपनी राशि अनुसार होली के लिए कपड़ों और गुलाल / अबीर के रंग का चयन करें

मेष राशिमेष राशि वालों के लिए लाल और गुलाबी रंग सर्वोत्तम है साथ ही लाल कपड़े पहन कर लाल गुलाल में गुलाब की खुशबु मिला कर होली खेलें तो शुभ रहेगा।
मेष राशि वाले जातक मसूर की दाल की बना कोई भी पकवान अपने मेहमानों को खिलाएं।
होली खेलने के बाद नये कपड़े पहन कर सीधे घर के मन्दिर में जायें और भगवान का आशीर्वाद लें।


वृषभ राशिवृषभ राशि के लोग सफेद और क्रीम रंग से होली खेलें। साथ ही सिल्क के सफेद या स्काईब्लू रंग के कपडे पहन कर नीले रंग मे चमेली की खुशबु मिला कर होली खेलें।
वृष राशि वाले जातक कोई भी सुगन्धित मिठाई मेहमानों को परोसें।
होली खेलने के बाद नये कपड़े पहनने के तुरन्त बाद सीढ़ियां चढ़ें या गणेश जी के दर्शन करें।


मिथुन राशिमिथुन राशि के लोगों के लिए हरा और पीले रंग शुभ होता है सिन्थैटिक हरे रंग के कपडे पहन कर हरे गुलाल मे चम्पा की खुशबु मिला कर होली खेलें।
होली के पकवान बनाने के लिए मूंग की दाल उपयोग में लाएं ।
होली खेलने के बाद खजूर खायें या मोज़े जरुर पहनें।

कर्क राशिकर्क राशि के लोगों के लिए सफेद और क्रीम रंग का उपयोग बेहतर होगा। 
कर्क राशि के जातक सफेद कॉटन या गुलाबी रंग के कपडे पहन कर गुलाबी रंग में लवैन्डर की खुशबु मिला कर होली खेलें।
कर्क राशि वाले जातक दूध से बनी मिठाई या कोई भी पकवान मेहमानों को परोसें।
होली खेलने के बाद केसर की पत्ती मुंह में डालें।

सिंह राशिसिंह राशि वालों के लिए पीला और केसरिया रंग काफी अच्छा होता है।
सिंह राशि के जातक लिनिन ऑरेन्ज या सफेद कपडे पहन कर आंरेन्ज अबीर / गुलाल में कस्तूरी की खुशबु मिला कर होली खेलें।
सिंह राशि वाले जातक गरम -गरम दूध परोसें।
होली खेलने के बाद लाल सिन्दूर का टीका मस्तक पर लगायें।

कन्या राशिकन्या राशि के लोगों के लिए हरा रंग श्रेष्ठ माना जाता है।
कन्या राशि के जातक हरे रंग के कॉटन के कपडे पहन कर हरे रंग के गुलाल में नाग चम्पा की खुशबु मिला कर होली खेलें।
कन्या राशि वाले जातक आज के दिन अपने मेहमानों को पिस्ते से बनी बर्फी परोसें।
होली खेलने के बाद कपूर को हाथ में मसल कर सूंघना चाहिये।

तुला राशितुला राशि के लोगों के लिए सफेद और पीला रंग शुभ होता है। 
 तुला राशि के जातक स्काईब्लू / सफेद सिल्क रंग के कपड़े पहने और नीले रंग के गुलाल में बेला की खुशबु मिला कर होली खेलें। तुला राशि के जातक दही या मलाई से बने हुए पकवान अपने मेहमानों को परोसें| होली खेलने के बाद शहतूत खाना चाहिये।


 वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि के लोगों के लिए लाल और गुलाबी रंग श्रेष्ठ है। वृश्चिक राशि के जातक मैरून या ब्राउन कॉटन के कपडे पहने और मैरून रंग के गुलाल में रोज मैरी की खुशबु मिला कर होली खेलें।
आज आप अपने मेहमानों को कुछ तीखा खिलाएं जिसमे लाल मिर्च का प्रयोग अवश्य हुआ हो।
होली खेलने के बाद सर पर टोपी लगाना या पगड़ी बांधना विशेष शुभ होता है।


धनु राशिधनु राशि के लोगों के लिए लाल व पीला रंग सर्वोत्तम है।
 धनु राशि के जातक सिल्क क्रीम रंग के कपडे पहन कर पीले रंग के गुलाल में केसर /केसर की खुशबु मिला कर होली खेलें।
मेहमानों के लिए बनने वाले पकवानों में आज धनु राशि के जातक केसर जरूर मिलाएं केसर बर्फी या गुझिया खिलाएं। होली खेलने के बाद नये कपड़े पहनने के बाद बांई आंख से चांदी को स्पर्श करना शुभ होगा।


 मकर राशिमकर राशि के लोगों के लिए नीला और हरा रंग शुभ माना गया है।  मकर राशि के जातक सिन्थैटिक ब्लू या ब्राउन रंग के कपडे पहन कर नीले रंग के गुलाल में मुश्कम्बर की खुशबु मिला कर होली खेलें।
मकर राशि के जातक आज चॉकलेट बर्फी से मेहमानों का मुँह मीठा करवाये।
होली खेलने के बाद नये कपड़े में एक पेन लगाकर घर से निकले।
नये कपड़े में एक पेन लगाकर घर से निकले।

 कुंभ राशिकुंभ राशि के लोगों के लिए नीला रंग शुभ होता है। कुम्भ राशि के जातक नीले या काले रंग के कपडे पहन पर्पल रंग के गुलाल में चन्दन मिला कर होली खेलें| कुम्भ राशि के जातक आप होली के शुभावसर पर अपने मेहमानों को कला नमक डाल कर दही बड़े खिलाएं।
होली खेलने के बाद नये कपड़े पहनने से पहले चेहरे को दही से धोना चाहिये और कपड़ो पर सुगन्ध जरुर लगानी चाहिये।

 मीनमीन राशि वालों को हर संभव पीले और लाल रंग से ही होली खेलना चाहिए।  मीन राशि के जातक सिल्क के गोल्डन येलो रंग के कपडे पहने और पीले रंग के गुलाल में लैमन ग्रास मिला कर होली खेलें।
धनु राशि के जातक आज होली के अवसर पर बेसन की बर्फी/ लड़डू से अपने मेहमानों का मुँह मीठा करवाएं।
होली खेलने के बाद नये कपड़े पहनने के बाद थोड़ा गुड़ खाना शुभ रहेगा।


होलिका दहन का शास्त्रोक्त नियम


होलिका दहन मुहूर्त: अंजु आनंद
20 मार्च 2019 बुधवार
पूर्णिमा तिथि आरंभ - 20 मार्च 2019 प्रातः 10:44 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त - 21 मार्च- 2019 प्रातः 07:12 बजे
भद्रा (विष्टि करण) प्रात:10.44 बजे से रात्रि 8.59 बजे तक
भद्रा पूंछ -17:24 से 18:25 बजे तक
भद्रा मुख - 18:25 से 20:07 बजे तक
होलिका-दहन मुहूर्त - 9 बज कर 28 मिनट से रात्रि 11:58 तक

होलिका दहन का शास्त्रोक्त नियम
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। होलिका दहन रंगोत्सव की पूर्व सन्ध्या पर पूर्णिमा तिथि में प्रदोष काल में किया जाता है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार होलिका दहन के समय भद्रा नहीं होनी चाहिए। भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि, होलिका दहन के लिये उत्तम मानी जाती है। यदि ऐसा योग नहीं बैठ रहा हो तो भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन किया जा सकता है। और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा में रंग अर्थात दुलेन्दि का पर्व मनाया जाता है।
होलिका दहन में आहुतियाँ देना बहुत ही जरुरी माना गया है इसलिए होलिका दहन में आहुतियाँ जरुर दें।
ऐसा माना जाता है कि पूजा में जलती होली में दिया गया ये भाग सीधे भगवान तक जाता है।
होलिका में कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर. आदि की आहुति दी जाती है।

अहकूटा भयत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम:


होलिका दहन में आहुति देने के पश्चात् सुबह प्रभु को रंग लगा कर होली खेलने का शुभारम्भ करिये होली खेलना वर्ष पर्यन्त आपको खुश रखता है।

होली के इस पावन पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा वसंतागम के उपलक्ष्य में किया हु‌आ यज्ञ भी माना जाता है। वैदिक काल में इस होली के पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। पुराणों के अनुसार ऐसी भी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से होली का प्रचलन हु‌आ।
मान्यता है कि होलिका दहन के समय उसकी उठती हुई लौ से समाज और वातावरण के आने वाले समय के बारे कई संकेत मिलते हैं। होलिका की लौ से ज्ञात कर सकते हैं के आने वाला समय समाज और जनसाधारण के लिए कैसा रहेगा
होलिका की अग्नि की लौ का पूर्व दिशा ओर उठना कल्याणकारी होता हैदक्षिण की ओर पशु पीड़ापश्चिम की ओर सामान्य और उत्तर की ओर लौ उठने से बारिश होने की संभावना रहती है। 

होलिका दहन की रात्रि को तंत्र साधना एवं तांत्रिक क्रियाओं की दृष्टि से हमारे शास्त्रों में महत्वपूर्ण माना गया है। तंत्र साधना व लक्ष्मी प्राप्ति के साथ साथ खुद पर किये गए तंत्र मंत्र के प्रतिरक्षण हेतु भी होली की रात्रि सबसे उपयुक्त मानी गई है।
          
होली के दिन तुलसी माला से निम्न मंत्र का पांच माला जाप करने से लाभ होता है।
राम रामेति रामेति रामे रामे मनोरमे। 
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नामं वारानने।।

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धर्म शब्द संस्कृत कीधृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है धारण करना । परमात्मा की सृष्टि को धारण करने या बनाये रखने के लिए जो कर्म और कर्तव्य आवश्यक हैं वही मूलत: धर्म के अंग या लक्षण हैं । उदाहरण के लिए निम्न श्लोक में धर्म के दस लक्षण बताये गये हैं :-

धृति: क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्

विपत्ति में धीरज रखना, अपराधी को क्षमा करना, भीतरी और बाहरी सफाई, बुद्धि को उत्तम विचारों में लगाना, सम्यक ज्ञान का अर्जन, सत्य का पालन ये छ: उत्तम कर्म हैं और मन को बुरे कामों में प्रवृत्त न करना, चोरी न करना, इन्द्रिय लोलुपता से बचना, क्रोध न करना ये चार उत्तम अकर्म हैं

अहिंसा परमो धर्म: सर्वप्राणभृतां वर

तस्मात् प्राणभृत: सर्वान् न हिंस्यान्मानुष: क्वचित्

अहिंसा सबसे उत्तम धर्म है, इसलिए मनुष्य को कभी भी, कहीं भी,किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।

न हि प्राणात् प्रियतरं लोके किंचन विद्यते

तस्माद् दयां नर: कुर्यात् यथात्मनि तथा परे

जगत् में अपने प्राण से प्यारी दूसरी कोई वस्तु नहीं है । इसीलिए मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है, उसी तरह दूसरों पर भी दया करे

जिस समाज में एकता है, सुमति है, वहाँ शान्ति है, समृद्धि है, सुख है, और जहाँ स्वार्थ की प्रधानता है वहाँ कलह है, संघर्ष है, बिखराव है, दु:ख है, तृष्णा है ।

धर्म उचित और अनुचित का भेद बताता है । उचित क्या है और अनुचित क्या है यह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है । हमें जीवनऱ्यापन के लिए आर्थिक क्रिया करना है या कामना की पूर्ति करना है तो इसके लिए धर्मसम्मत मार्ग या उचित तरीका ही अपनाया जाना चाहिए । हिन्दुत्व कहता है -

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वत:

नित्यं सन्निहितो मृत्यु: कर्र्तव्यो धर्मसंग्रह:

यह शरीर नश्वर है, वैभव अथवा धन भी टिकने वाला नहीं है, एक दिन मृत्यु का होना ही निश्चित है, इसलिए धर्मसंग्रह ही परम कर्त्तव्य है

सर्वत्र धर्म के साथ रहने के कारण हिन्दुत्व को हिन्दू धर्म भी कहा जाता है

हिन्दू धर्म के मूल तत्वों में सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और दान मुख्य हैं |अपने मन, वचन और कर्म से हिंसा से दूर रहने वाले मनुष्य को हिन्दू कहा गया है। हिन्दू धर्म का इतिहास वेदकाल से भी पहले का माना गया है और वेदों की रचना 4500 .पू. शुरू हुई। हिन्दू इतिहास ग्रंथ महाभारत और पुराणों में मनु (जिसे धरती का पहला मानव कहा गया है) का उल्लेख किया गया है। पुराणों के अनुसार हिन्दू धर्म सृष्टि के साथ ही पैदा हुआ। पुराना और विशाल होने के चलते इसे सनातन धर्म’ के नाम से भी जाना जाता है।हिन्दू विचारक कहता है उदारचरितानाम् वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दू धर्म अपने चरम पर प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा को ही देखता है |

स्त्रीत्व को अत्यधिक आदर प्रदान करना हिन्दू जीवन पद्धति के महत्त्वपूर्ण मूल्यों में से एक है । कहा गया है :-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:

जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता रमते हैं । जहाँ उनकी पूजा नहीं होती, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।

जिस कुल में स्त्रियाँ दु:खी रहती हैं, वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है । जहां वे दु:खी नहीं रहतीं, उस कुल की वृद्धि होती है ।

हिन्दू विचारों को प्रवाहित करने वाले वेद, उपनिषद्, स्मृतियां, षड्-दर्शन, गीता, रामायण और महाभारत हैं |

ये सभी ग्रन्थ हिन्दुत्व के उद्विकास एवं उसके विभिन्न पहलुओं के दर्शन कराते हैं ।

हिन्दू समाज उपनिषदों और गीता में वर्णित आत्मा की अमरता को स्वीकार करता है । गीता में कहा गया है-

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरो पराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।

जीर्ण वस्त्र को जैसे तजकर नव परिधान ग्रहण करता नर ।

वैसे जर्जर तन को तजकर धरता देही नवल कलेवर ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:

चैनं क्लेदयन्तापो शोषयति मारुत:

शस्त्रादि इसे काट पाते जला न सकता इसे हुताशन ।

सलिल प्रलेपन न आर्द्र कर खा न सकता प्रबल प्रभंजन ।

हिन्दू समाज गायत्री मंत्र को ईश्वर की आराधना के लिए सबसे बड़ा मंत्र मानता है जो इस प्रकार है-

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो

देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।

हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है | पुरुषार्थ या मनुष्य होने का तात्पर्य क्या है? हिन्दुत्व कहता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही पुरुषार्थ है । धर्म का तात्पर्य सदाचरण से है, अर्थ का तात्पर्य धनोपार्जन और जान-माल की रक्षा के लिए राज-व्यवस्था से है । काम का तात्पर्य विवाह, सन्तानोपत्ति एवं अर्जित धन का उपभोग कर इच्छाओं की पूर्ति से है । मोक्ष का तात्पर्य अर्थ और काम के कारण भौतिक पदार्थों एवं इन्द्रिय विषयों में उत्पन्न आसक्ति से मुक्ति पाने तथा आत्म-दर्शन से है । हिन्दू की दृष्टि में मध्य मार्ग ही सर्वोत्तम है । गृहस्थ जीवन ही परम आदर्श है । संन्यासी का अर्थ है सांसारिक कार्यों को एवं सम्पत्ति की देखभाल एक न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में करने वाला । अकर्मण्यता, गृह-त्याग या पलायनवाद का संन्यास से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आजीवन ब्रह्मचर्य भी हिन्दुत्व का आदर्श नहीं है, क्योंकि काम पुरुषार्थ का एक अंग है ।

हिन्दुओं के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ ऋग्वेद के अध्ययन से प्राय: यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि उसमें इन्द्र, मित्र,वरुण आदि विभिन्न देवताओं की स्तुति की गयी है किन्तु बहुदेववाद की अवधारणा का खण्डन करते हुए ऋग्वेद स्वयं ही कहता है-

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णो गरुत्मान्

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु:

(-१६४-४६)

जिसे लोग इन्द्र, मित्र,वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं

वास्तविक पुराण तो विभिन्न पन्थों के निर्माण में कहीं खो गया है किन्तु वास्तविक पुराण के कुछ श्लोक ईश्वर के एकत्व को स्पष्ट करते हैं यथा :-

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-

र्युक्त: पर: पुरुष एक इहास्य धत्ते

स्थित्यादये हरिविरंचि हरेति संज्ञा:

श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्ववतनोर्नृणां स्यु:

प्रकृति के तीन गुण हैं :- सत्त्व, रज और तम; इनको स्वीकार करके इस संसार की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय के लिए एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु , ब्रह्मा और रुद्र - ये तीन नाम ग्रहण करते हैं।

ऊपरी तौर पर यह लगता है कि हिन्दू वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य आदि सम्प्रदायों में बँटा हुआ है किन्तु सत्य यही है कि कर्ता ब्रह्म के किसी विशेषण जैसे विष्णु (सर्वव्यापी ईश्वर), शिव (कल्याणकर्ता ईश्वर), दुर्गा (सर्वशक्तिमान ईश्वर), गणेश (परम बुद्धिमान या सामूहिक बुद्धि का द्योतक ईश्वर) की उपासना ही होती है इसीलिए हिन्दू विष्णु,शिव, दुर्गा, काली आदि के नाम से बने मन्दिरों में समान श्रद्धा से जाता है

उपनिषदों में एकत्व की खोज के लिए विशेष प्रयत्न किया गया है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जीवात्मा और परमात्मा में अग्नि की लपट और उसकी चिनगारी जैसा सम्बन्ध है ईश्वर अलग किसी स्थान पर नहीं बैठा है उसका वास हमारे हृदय में है, सर्वत्र है वही सत्य रूप में सर्वत्र प्रकाशित है परमात्मा ही सब कुछ है; तभी तो उससे प्रार्थना की जाती है :-

तेजो सि तेजो मयि धेहि, वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि,

बलमसि बलं मयि धेहि, ओजोसि ओजो मयि धेहि

(यजुर्वेद १९-)

(हे भगवन्! आप तेजस्वरूप हैं, मुझमें तेज स्थापित कीजिए; आप वीर्य रूप हैं, मुझे वीर्यवान् कीजिए; आप बल रूप हैं, मुझे बलवान बनाइए; आप ओज स्वरूप हैं, मुझे ओजस्वी बनाइए।)

वैश्वीकरण पर बल देते हुए कहा गया है :-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्

(यह अपना है या यह पराया है, यह विचार छोटे मन वालों का है उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुम्ब है।)

सामाजिक एकता का सन्देश देते हुए कहा गया है :-

सह नाववतु सह नौ भुनुक्तु सह वीर्य करवावहै

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै

शान्ति: शान्ति: शान्ति:

प्रभु हम परस्पर रक्षा करें, साथ-साथ उपभोग करें, परस्पर सामर्थ्य बढ़ाकर तेजस्वी बनें विद्या-बुद्धि बढ़ाकर विद्वेष से दूर रहें इस प्रकार परम शान्ति का वरण करें

सार्वभौम भ्रातृत्व के साथ सार्वभौम कल्याण की कामना की गयी है :-

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु: भाग्भवेत्

सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु: से ग्रसित हो

हिन्दू धर्म में नीम, बेल, तुलसी, बरगद, पीपल, आंवला, आम आदि वृक्षों एवं पौधों को पूजा-अर्चना के साथ जोड़ा गया है ये वृक्ष औषधियों के निर्माण एवं पर्यावरण की रक्षा करने में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं वस्तुत: हिन्दुत्व में प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की चेष्टा की गयी है सम्पूर्ण प्रकृति ही ईश्वर का शरीर है इस प्रकार सूर्य,चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नदी आदि को देवत्व प्रदान कर उनकी पूजा की जाती हैं। विश्वहिन्दु समाज