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पौष मास राशि अनुसार भविष्य फल

 हिन्दू पंचांग के अनुसार सम्वतसर के दसवें मास को पौष मास कहा जाता है। पौष मास का आरम्भ दिसंबर की सौर संक्रांति (धनु संक्रांति) से होता है पौष मास को खर मास भी कहते हैं। इसे मल मास काला महीना भी कहा जाता है। 
खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभ-मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। कहा जाता है कि पौष मास में सूर्यदेव के पूजन से मान-सम्मान और यश में वृद्धि होती है पौष मास में सूर्य की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है। इस मास में सूर्य देव की उपासना भग नाम से की जाती है। आदित्य पुराण अनुसार पौष माह में तांबे के बर्तन में शुद्ध जल, लाल चंदन व लाल रंग के फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य मंत्र का जाप किया जाता है तथा व्रत रखकर सूर्य को तिल-चावल की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।










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Paush Mas / Khar Mas


खर मास - वैज्ञानिक एवं पौराणिक रहस्य

सम्वतसर के 12  मासों में से दो मासों को खरमास की संज्ञा दी गयी है जब सूर्यदेव बृहस्पति की राशियों धनु एवं मीन से विचरण करते हैं तो उसे खरमास या मल मास कहा जाता है उत्तराखण्ड में इसे काला महीना भी कहते हैं 

Relation between Uttarayan and Makar Sankranti

उत्तरायण और मकर संक्रांति का सम्बन्ध - वैज्ञानिक पहलू

'उत्तरायण' दो शब्दों से मिल कर बना है उत्तर + अयन

जिसका शाब्दिक अर्थ है - 'उत्तर दिशा में गमन'।

शीत अयनांत  अयनांत / अयनान्त (अंग्रेज़ी:सोलस्टिस) -
1. किसी अयन या गति का अंत
2. (ज्योतिष) दो अयनों के बीच का संधिकाल

जबकि संक्रांति दो राशियों के बीच का संधिकाल है

Deepwali 2018


गोवत्स द्वादशी - कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण पहली बार वन में गौ चारण के लिए गए थे। माता यशोदा ने शृंगार करके गौचारण के लिए तैयार किया और पूजा-पाठ के बाद गोपाल ने बछड़े खोल दिए। गोपालों द्वारा गोवत्संचारण की पुण्यतिथि को इसीलिए पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व पुत्र की मंगल-कामना के लिए किया जाता है। इसे पुत्रवती स्त्रियां करती हैं। इस पर्व पर गीली मिट्टी की गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर पाट पर रखी जाती हैं तब उनकी विधिवत पूजा की जाती है। गौ पृथ्वी का प्रतीक मानी जाती है तथा इन्हीं में तैंतीस कोटी देवी-देवता वास करते हैं।शास्त्रनुसार इस दिन गाय व बछड़े के पूजन का विधान है इसलिए इस रोज गाय के दूध और उस से बानी वस्तुए प्रयोग नहीं की जाती है।


यमदीपदानं - धनत्रयोदशीके दिन यमदीपदान करनेका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व. 

दीपावली के काल में धनत्रयोदशी, नरकचतुर्दशी एवं यमद्वितीया, इन तीन दिनों पर यमदेव के लिए दीपदान करते हैं। 
यमराज का कार्य है प्राण हरण करना । काल मृत्यु से बचना या उसे टालना असम्भव है परंतु ‘किसीको भी अकाल मृत्यु न आए’, इस हेतु धनत्रयोदशी पर यमधर्म के उद्देश्य से गेहूं के आटे से बने तेलयुक्त (तेरह) दीप संध्याकाल के समय घर के बाहर दक्षिणाभिमुख लगाएं। 
सामान्यतः दीपोंको कभी दक्षिणाभिमुख नहीं रखते, केवल इसी दिन इस प्रकार रखते हैं ।





धनत्रयोदशी के दिन यमदीपदान का विशेष महत्त्व है। जो स्कंद-पुराणके इस श्लोकसे स्पष्ट होता है,
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।।      – स्कंदपुराण
इसका अर्थ है, कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकालमें घर के बाहर यमदेव के उद्देश्य से दीप रखने से अपमृत्यु का निवारण होता है ।
इस संदर्भ में एक कथा है, कि यमदेव ने अपने दूतों को आश्वासन दिया कि धनत्रयोदशी के दिन यमदेव के लिए दीपदान करने वाले की अकाल मृत्यु नहीं होगी ।
दीप प्राण शक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है। दीपदान करनेसे व्यक्ति को तेज की प्राप्ति होती है । इससे उसकी प्राण शक्ति में वृद्धि होती है तथा उसे दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है ।



 यम दीपदान के लिए संकल्प 
मम अपमृत्यु विनाशार्थम् यमदीपदानं करिष्ये ।

इसका अर्थ है, अपनी अपमृत्युके निवारण हेतु मैं यमदीपदान करता हूं ।

दीप को चंदन, हलदी, कुमकुम एवं अक्षतादि से पूजन करके पुष्पअर्पित कर नमस्कार किया जाता है ।

घर के मुख्य द्वार के बाहर दीपक को दक्षिण दिशा की ओर मुख कर रखा जाता है । यमदेवता को उद्देशित कर प्रार्थना की जाती है ।

मृत्युना पाशदंडाभ्यां कालेन श्यामयासह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतां मम ।। – स्कंदपुराण

इसका अर्थ है, धनत्रयोदशी पर यह दीप मैं सूर्यपुत्र को अर्थात् यमदेवता को अर्पित करता हूं । मृत्युके पाश से वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें ।




प्रदोष_काल -






















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धर्म शब्द संस्कृत कीधृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है धारण करना । परमात्मा की सृष्टि को धारण करने या बनाये रखने के लिए जो कर्म और कर्तव्य आवश्यक हैं वही मूलत: धर्म के अंग या लक्षण हैं । उदाहरण के लिए निम्न श्लोक में धर्म के दस लक्षण बताये गये हैं :-

धृति: क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्

विपत्ति में धीरज रखना, अपराधी को क्षमा करना, भीतरी और बाहरी सफाई, बुद्धि को उत्तम विचारों में लगाना, सम्यक ज्ञान का अर्जन, सत्य का पालन ये छ: उत्तम कर्म हैं और मन को बुरे कामों में प्रवृत्त न करना, चोरी न करना, इन्द्रिय लोलुपता से बचना, क्रोध न करना ये चार उत्तम अकर्म हैं

अहिंसा परमो धर्म: सर्वप्राणभृतां वर

तस्मात् प्राणभृत: सर्वान् न हिंस्यान्मानुष: क्वचित्

अहिंसा सबसे उत्तम धर्म है, इसलिए मनुष्य को कभी भी, कहीं भी,किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।

न हि प्राणात् प्रियतरं लोके किंचन विद्यते

तस्माद् दयां नर: कुर्यात् यथात्मनि तथा परे

जगत् में अपने प्राण से प्यारी दूसरी कोई वस्तु नहीं है । इसीलिए मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है, उसी तरह दूसरों पर भी दया करे

जिस समाज में एकता है, सुमति है, वहाँ शान्ति है, समृद्धि है, सुख है, और जहाँ स्वार्थ की प्रधानता है वहाँ कलह है, संघर्ष है, बिखराव है, दु:ख है, तृष्णा है ।

धर्म उचित और अनुचित का भेद बताता है । उचित क्या है और अनुचित क्या है यह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है । हमें जीवनऱ्यापन के लिए आर्थिक क्रिया करना है या कामना की पूर्ति करना है तो इसके लिए धर्मसम्मत मार्ग या उचित तरीका ही अपनाया जाना चाहिए । हिन्दुत्व कहता है -

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वत:

नित्यं सन्निहितो मृत्यु: कर्र्तव्यो धर्मसंग्रह:

यह शरीर नश्वर है, वैभव अथवा धन भी टिकने वाला नहीं है, एक दिन मृत्यु का होना ही निश्चित है, इसलिए धर्मसंग्रह ही परम कर्त्तव्य है

सर्वत्र धर्म के साथ रहने के कारण हिन्दुत्व को हिन्दू धर्म भी कहा जाता है

हिन्दू धर्म के मूल तत्वों में सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और दान मुख्य हैं |अपने मन, वचन और कर्म से हिंसा से दूर रहने वाले मनुष्य को हिन्दू कहा गया है। हिन्दू धर्म का इतिहास वेदकाल से भी पहले का माना गया है और वेदों की रचना 4500 .पू. शुरू हुई। हिन्दू इतिहास ग्रंथ महाभारत और पुराणों में मनु (जिसे धरती का पहला मानव कहा गया है) का उल्लेख किया गया है। पुराणों के अनुसार हिन्दू धर्म सृष्टि के साथ ही पैदा हुआ। पुराना और विशाल होने के चलते इसे सनातन धर्म’ के नाम से भी जाना जाता है।हिन्दू विचारक कहता है उदारचरितानाम् वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दू धर्म अपने चरम पर प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा को ही देखता है |

स्त्रीत्व को अत्यधिक आदर प्रदान करना हिन्दू जीवन पद्धति के महत्त्वपूर्ण मूल्यों में से एक है । कहा गया है :-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:

जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता रमते हैं । जहाँ उनकी पूजा नहीं होती, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।

जिस कुल में स्त्रियाँ दु:खी रहती हैं, वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है । जहां वे दु:खी नहीं रहतीं, उस कुल की वृद्धि होती है ।

हिन्दू विचारों को प्रवाहित करने वाले वेद, उपनिषद्, स्मृतियां, षड्-दर्शन, गीता, रामायण और महाभारत हैं |

ये सभी ग्रन्थ हिन्दुत्व के उद्विकास एवं उसके विभिन्न पहलुओं के दर्शन कराते हैं ।

हिन्दू समाज उपनिषदों और गीता में वर्णित आत्मा की अमरता को स्वीकार करता है । गीता में कहा गया है-

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरो पराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।

जीर्ण वस्त्र को जैसे तजकर नव परिधान ग्रहण करता नर ।

वैसे जर्जर तन को तजकर धरता देही नवल कलेवर ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:

चैनं क्लेदयन्तापो शोषयति मारुत:

शस्त्रादि इसे काट पाते जला न सकता इसे हुताशन ।

सलिल प्रलेपन न आर्द्र कर खा न सकता प्रबल प्रभंजन ।

हिन्दू समाज गायत्री मंत्र को ईश्वर की आराधना के लिए सबसे बड़ा मंत्र मानता है जो इस प्रकार है-

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो

देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।

हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है | पुरुषार्थ या मनुष्य होने का तात्पर्य क्या है? हिन्दुत्व कहता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही पुरुषार्थ है । धर्म का तात्पर्य सदाचरण से है, अर्थ का तात्पर्य धनोपार्जन और जान-माल की रक्षा के लिए राज-व्यवस्था से है । काम का तात्पर्य विवाह, सन्तानोपत्ति एवं अर्जित धन का उपभोग कर इच्छाओं की पूर्ति से है । मोक्ष का तात्पर्य अर्थ और काम के कारण भौतिक पदार्थों एवं इन्द्रिय विषयों में उत्पन्न आसक्ति से मुक्ति पाने तथा आत्म-दर्शन से है । हिन्दू की दृष्टि में मध्य मार्ग ही सर्वोत्तम है । गृहस्थ जीवन ही परम आदर्श है । संन्यासी का अर्थ है सांसारिक कार्यों को एवं सम्पत्ति की देखभाल एक न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में करने वाला । अकर्मण्यता, गृह-त्याग या पलायनवाद का संन्यास से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आजीवन ब्रह्मचर्य भी हिन्दुत्व का आदर्श नहीं है, क्योंकि काम पुरुषार्थ का एक अंग है ।

हिन्दुओं के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ ऋग्वेद के अध्ययन से प्राय: यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि उसमें इन्द्र, मित्र,वरुण आदि विभिन्न देवताओं की स्तुति की गयी है किन्तु बहुदेववाद की अवधारणा का खण्डन करते हुए ऋग्वेद स्वयं ही कहता है-

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णो गरुत्मान्

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु:

(-१६४-४६)

जिसे लोग इन्द्र, मित्र,वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं

वास्तविक पुराण तो विभिन्न पन्थों के निर्माण में कहीं खो गया है किन्तु वास्तविक पुराण के कुछ श्लोक ईश्वर के एकत्व को स्पष्ट करते हैं यथा :-

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-

र्युक्त: पर: पुरुष एक इहास्य धत्ते

स्थित्यादये हरिविरंचि हरेति संज्ञा:

श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्ववतनोर्नृणां स्यु:

प्रकृति के तीन गुण हैं :- सत्त्व, रज और तम; इनको स्वीकार करके इस संसार की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय के लिए एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु , ब्रह्मा और रुद्र - ये तीन नाम ग्रहण करते हैं।

ऊपरी तौर पर यह लगता है कि हिन्दू वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य आदि सम्प्रदायों में बँटा हुआ है किन्तु सत्य यही है कि कर्ता ब्रह्म के किसी विशेषण जैसे विष्णु (सर्वव्यापी ईश्वर), शिव (कल्याणकर्ता ईश्वर), दुर्गा (सर्वशक्तिमान ईश्वर), गणेश (परम बुद्धिमान या सामूहिक बुद्धि का द्योतक ईश्वर) की उपासना ही होती है इसीलिए हिन्दू विष्णु,शिव, दुर्गा, काली आदि के नाम से बने मन्दिरों में समान श्रद्धा से जाता है

उपनिषदों में एकत्व की खोज के लिए विशेष प्रयत्न किया गया है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जीवात्मा और परमात्मा में अग्नि की लपट और उसकी चिनगारी जैसा सम्बन्ध है ईश्वर अलग किसी स्थान पर नहीं बैठा है उसका वास हमारे हृदय में है, सर्वत्र है वही सत्य रूप में सर्वत्र प्रकाशित है परमात्मा ही सब कुछ है; तभी तो उससे प्रार्थना की जाती है :-

तेजो सि तेजो मयि धेहि, वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि,

बलमसि बलं मयि धेहि, ओजोसि ओजो मयि धेहि

(यजुर्वेद १९-)

(हे भगवन्! आप तेजस्वरूप हैं, मुझमें तेज स्थापित कीजिए; आप वीर्य रूप हैं, मुझे वीर्यवान् कीजिए; आप बल रूप हैं, मुझे बलवान बनाइए; आप ओज स्वरूप हैं, मुझे ओजस्वी बनाइए।)

वैश्वीकरण पर बल देते हुए कहा गया है :-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्

(यह अपना है या यह पराया है, यह विचार छोटे मन वालों का है उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुम्ब है।)

सामाजिक एकता का सन्देश देते हुए कहा गया है :-

सह नाववतु सह नौ भुनुक्तु सह वीर्य करवावहै

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै

शान्ति: शान्ति: शान्ति:

प्रभु हम परस्पर रक्षा करें, साथ-साथ उपभोग करें, परस्पर सामर्थ्य बढ़ाकर तेजस्वी बनें विद्या-बुद्धि बढ़ाकर विद्वेष से दूर रहें इस प्रकार परम शान्ति का वरण करें

सार्वभौम भ्रातृत्व के साथ सार्वभौम कल्याण की कामना की गयी है :-

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु: भाग्भवेत्

सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु: से ग्रसित हो

हिन्दू धर्म में नीम, बेल, तुलसी, बरगद, पीपल, आंवला, आम आदि वृक्षों एवं पौधों को पूजा-अर्चना के साथ जोड़ा गया है ये वृक्ष औषधियों के निर्माण एवं पर्यावरण की रक्षा करने में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं वस्तुत: हिन्दुत्व में प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की चेष्टा की गयी है सम्पूर्ण प्रकृति ही ईश्वर का शरीर है इस प्रकार सूर्य,चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नदी आदि को देवत्व प्रदान कर उनकी पूजा की जाती हैं। विश्वहिन्दु समाज